Friday, December 7, 2018

खेतों को महिलावादी आंदोलनों की ज़रूरत क्यों?: ब्लॉग

किसान और महिला किसान में क्या अंतर होता है? आदर्श रूप से इनमें कोई अंतर नहीं होना चाहिए.

एक कर्मी और महिलाकर्मी, एक खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी और यहां तक कि मर्द और औरत के बीच किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.

लेकिन ऐसा नहीं है. हमलोग एक आदर्श दुनिया में नहीं जीते हैं. इसलिए हमलोग गैरबराबरी, पितृसत्ता, यौन दुर्व्यवहार जैसी चीज़ों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं. और महिलावादी आंदोलन भी इन्हीं सब चीज़ों की बात करता है.

समान अधिकार, समान वेतन, निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागिता और किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हल्ला बोलना ही इसका मक़सद है.

तो फिर महिलावादी आंदोलनों से हमने महिला किसानों को दूर क्यों रखा है?

हमारे देश में किसानों की स्थिति कैसी है, यह किसी से छिपा नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं, "हमारे सामने बहुत बड़ा कृषि संकट आ खड़ा हुआ है और अगर हमने इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की तो इसका भारी असर होगा."

शायद इसलिए किसान बार-बार आंदोलन कर रहे हैं. दिल्ली, मुंबई समेत पूरे देश में वो अपनी मांगों को लेकर मोर्चा और रैलियां निकाल रहे हैं.

लेकिन किसी ने भी महिला किसानों के मुद्दे पर बात नहीं की. बेशक महिला किसानों की परेशानियां पुरुष किसानों से अलग नहीं हैं, लेकिन वो निश्चित रूप से अधिक हैं.

सरकार, किसानों के संगठन और महिलावादी आंदोलन कब इस पर विचार करेंगे कि महिला किसानों को क़र्ज़माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के कहीं अधिक मदद की ज़रूरत है.

घरेलू हिंसा और यौन दुर्व्यवहार की शिकार महिला किसान

दिल्ली में किसानों के मार्च के दौरान मेरी मुलाक़ात महिला किसान अधिकार मंच की एक्टिविस्ट सीमा कुलकर्णी से हुई.

सीमा कहती हैं, "कोई महिला किसानों की तकलीफ़ों पर बात नहीं करता, जिसे उन्हें सिर्फ़ एक महिला होने के चलते झेलना पड़ता है. दुर्भाग्य से जब भी मीडिया किसानों की बात करता है, वो महिला किसानों के मुद्दों को किनारे कर देता है."

एक अध्ययन के मुताबिक़ क़रीब 78 फ़ीसदी महिला किसानों को यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है और यहीं से चिंताओं की शुरुआत होती है.

इसके अलावा उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है और उन्हें उनके अधिकारों और निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है.

मैं महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाक़े मराठवाड़ा की एक महिला किसान से बात कर रही थी. उनके और उनके पति के पास एक छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा है, जिस पर वो खेती करते हैं.

उनके पति उन्हें अक्सर पीटा करते हैं. एक बार उनके पति ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था और दूसरी महिला के साथ शादी रचा ली थी.

इसके कुछ दिन बाद उनके पति ने दूसरी महिला के साथ भी मारपीट शुरू कर दी. अब दोनों साथ रहती हैं और बच्चों के पेट भरने के लिए मज़दूरी करती हैं.

वो कहती हैं, "जिस खेत को मैं और मेरे पति जोता करते थे, अगर मैं उस ज़मीन पर मेरा भी हक़ होता तो मेरी स्थिति कुछ अलग होती."

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