बेगूसराय में चाहे जो जीते लेकिन यहां लोग इस बात का पूरा श्रेय दे रहे हैं कि कन्हैया कुमार के कारण शहर की चर्चा देश भर में हो रही है.
यहां के अच्छे होटलों में जगह नहीं है. कन्हैया के कारण शहर में सैकड़ों ऐसे लोग पहुंचे हैं जो इससे पहले कभी बिहार नहीं आए. यहां तक कि विदेशी रिसर्चर भी पहुंचे हैं और कन्हैया के चुनावी अभियान को क़रीब से देख रहे हैं.
फ़्रांस के थॉमस जो भी इन्हीं रिसर्चरों में से एक हैं. बुधवार की दोपहर थॉमस कन्हैया के कैंपेन को देखने के बाद लंच कर रहे थे तभी उनसे मुलाक़ात हुई.
थॉमस का आकलन है कि कन्हैया जातीय वोट बैंक को तोड़ते दिख रहे हैं और उन्हें हर जाति से वोट मिलेगा. थॉमस का मानना है कि संभव है कि कन्हैया को सबसे कम वोट उनकी अपनी जाति भूमिहार से मिले.
थॉमस पिछले 12 दिनों से बेगूसराय में हैं. वो मुस्लिम बस्तियों में जा रहे हैं, दलितों से मिल रहे हैं और इस चीज़ को समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कोई युवा जातीय वोट बैंक को ब्रेक कर सकता है या नहीं.
थॉमस को बेगूसराय की गलियों और गांवों में झारखंड के सरफ़राज़ घूमा रहे हैं. सरफ़राज़ जेएनयू में इतिहास से एमए कर रहे हैं.
सरफ़ाज़ पिछले 20 दिनों से बेगूसराय में हैं और उन्होंने मुस्लिम बस्तियों में घूमकर लोगों के मिजाज़ को समझने की कोशिश की.
सरफ़राज़ कहते हैं, ''मुसलान कन्हैया को लेकर बहुत आशान्वित हैं. कन्हैया को ये ध्यान से सुन रहे हैं. तनवीर हसन के कारण इनके मन में पसोपेश की स्थिति ज़रूर है. लेकिन इतना तय है कि 50 फ़ीसदी से ज़्यादा मुसलमानों का वोट कन्हैया को ज़रूर मिलेगा.''
बेगूसराय में मुसलान वोटरों की तादाद लगभग तीन लाख है. यहां किसी एक जाति में भूमिहार सबसे बड़ा तबक़ा है. भूमिहार वोटर चार लाख से ज़्यादा हैं.
भूमिहारों के बाद दलित वोटर सबसे ज़्यादा हैं. सरफ़राज़ का भी मानना है कि कन्हैया को अपनी जाति से बहुत ज़्यादा वोट नहीं मिलेगा.
बेगूसराय के आम मुसलमान आरजेडी उम्मीदवार तनवीर हसन के साथ रहने की बात तो करते हैं लेकिन कन्हैया की भी तारीफ़ करते हैं.
सोमवार को बेगूसराय के बछवाड़ा में तेजस्वी यादव की रैली में आए मोहम्मद तबरेज़ से पूछा कि मुसलान क्या सोच रहे हैं?
उनका जवाब था, ''तनवीर हसन ठीक हैं. कन्हैया भी ठीक हैं. लेकिन कन्हैया को सीपीआई से नहीं लड़ना चाहिए था. वो निर्दलीय रहते तो ज़्यादा अच्छा होता.''
बेगूसराय में ग़ैर-भूमिहारों में कन्हैया की छवि अच्छी है लेकिन उनकी पार्टी की छवि अच्छी नहीं है. यहां तक कि मुसलमानों में भी सीपीआई की छवि बहुत अच्छी नहीं है.
सीपीआई यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की छवि ग़ैर-भूमिहारों में ऊंची जाति की पार्टी के तौर पर है. बेगूसराय में अभी की सीपीआई की कमान के लिहाज़ देखें तो ये बात सही भी लगती है. अभी हाल ही में तेजस्वी ने कहा कि बिहार में वर्तमान सीपीआई एक ज़िले और एक जाति की पार्टी है.
बेगूसराय में सीपीएम नेता और वामपंथी विचारक भगवान प्रसाद सिन्हा कहते हैं कि तेजस्वी को जो सिखाया जा रहा है वो कह रहे हैं.
सिन्हा कहते हैं, ''लालू प्रसाद भी यही नारा देते थे कि सीपीआई भूमिहारों की पार्टी है. 90 के दशक में सीपीआई जलालुद्दीन अंसारी के नेतृत्व में आगे बढ़ी. कम्युनिस्ट पार्टी में जाति के नाम पर नेतृत्व नहीं मिलता है. जिसमें क्षमता है वो नेतृत्व संभालता है. रामावतार यादव शास्त्री पटना से एमपी रहे. रामअसरे यादव एमपी बने, चंद्रशेखर सिंह यादव एमपी बने, सूरज प्रसाद सिंह कुशवाहा एमपी रहे. जिस समय सीपीआई की बिहार में अच्छी स्थिति थी उस वक़्त की ये हालत थी. कई मुसलमान विधायक बने. क्या अब भी इसे भूमिहारों की पार्टी कहेंगे?''
भगवान सिन्हा कहते हैं, ''कन्हैया जाति की राजनीति करता तो उसे सबसे ज़्यादा अपनी जाति से वोट मिलता जबकि सच ये है कि सबसे कम मिलेगा. कन्हैया का कोई वोट बैंक नहीं है. वोट बैंक है तनवीर हसन और बीजेपी का. कन्हैया वोट बैंक की राजनीति को तोड़ रहा है और यह अब दिखने भी लगा है.''
सिन्हा मानते हैं कि कन्हैया के उभार से तेजस्वी ख़ुद को राजनीतिक रूप से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं इसलिए वादा करने के बाद भी बेगूसराय में तनवीर हसन को महागठबंधन का उम्मीदवार बना दिया.
हालांकि तनवीर हसन इस बात से इनकार करते हैं कि तेजस्वी ने कन्हैया को उम्मीदवार बनाने का कोई वादा किया था.
तनवीर हसन का मानना है कि भले सीपीआई ऊपरी तौर से जाति विरोधी बातें करती है लेकिन इनके नेताओं के आचरण में जातीय श्रेष्ठता की ग्रंथि उतनी ही मज़बूत है.
भगवान सिन्हा कहते हैं कि तनवीर हसन भूमिहार मुसलान हैं इसलिए वो श्रेष्ठता की ग्रंथि का आरोप दूसरों पर नहीं लगा सकते. सिन्हा कहते हैं कि हसन का परिवार भूमिहार से ही मुसलान बना था.
तनवीर हसन 2014 के चुनाव में बीजेपी से 58 हज़ार वोटों से हारे थे. मोदी लहर में भी तनवीर हसन को इतना वोट क्यों मिला था?
सरफ़राज़ कहते हैं, ''तनवीर हसन को तीन लाख 61 हज़ार जो वोट मिले थे वो केवल आरजेडी के वोट नहीं थे. मुसलमानों ने मोदी के कारण उन्हें एकमुश्त वोट किया था. 2014 में तनवीर को सीआईएमएल का भी वोट मिला था. इस बार वो स्थिति नहीं है.''
बेगूसराय के भूमिहार कन्हैया को भविष्य के नेता के तौर पर स्वीकार करने को तैयार क्यों नहीं हैं? भगवान सिन्हा कहते हैं कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कन्हैया ख़ुद भी किसी तबक़े का नेता बनने नहीं आया है.
लेकिन जो भूमिहार वोट करेंगे वो क्यों करेंगे? बेगूसराय में हिन्दुस्तान दैनिक अख़बार के ब्यूरो प्रमुख स्मित पराग कहते हैं, ''कन्हैया जल्लेवाड़ भूमिहार हैं और बेगूसराय में कुल भूमिहारों में ये लगभग आधे हैं. जल्लेवाड़ों में कन्हैया को लेकर सहानुभूति है और ये वोट करेंगे.''
Thursday, April 25, 2019
Thursday, April 11, 2019
सोनिया गांधी ने रायबरेली और स्मृति इरानी ने अमेठी से पर्चा भरा
नामांकन के पहले उन्होंने हवन किया और एक रोड शो के बाद पर्चा भरने पहुँचीं. इस दौरान उनके बेटे और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, उनकी बेटी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, प्रियंका के पति रॉबर्ड वाड्रा और नाती रेहान और नातिन मिराया मौजूद थे.
सोनिया गांधी 2004 से लगातार रायबरेली का प्रतिनिधित्व करती रही हैं. इससे पहले वो 1999 में अमेठी से सांसद चुनी गई थीं.
वहीं पड़ोसी ज़िले अमेठी से बीजेपी की ओर से स्मृति इरानी ने भी पूजा अर्चना के बाद पर्चा भरा. उनके साथ उनके पति भी मौजूद थे. स्मृति इरानी वहाँ एक बार फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को चुनौती दे रही हैं.
स्मृति इरानी ने भी वहाँ रोड शो किया जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे.
इससे पहले वो यहां रोड शो कर रहे थे. उनके साथ पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, रॉबर्ट वाड्रा सहित पार्टी के सैंकड़ों कार्यकर्ता मौजूद थे.
राहुल गांधी पिछले 15 सालों से यहां से जीतते रहे हैं. यहां उनके ख़िलाफ़ मैदान में बीजेपी की तरफ से स्मृति इरानी होंगी.
राजस्थान में गुर्जरों के नेता किरोड़ी मल बैंसला ने बीजेपी का दामन थाम लिया है.
उनके साथ उनके बेटे विजय बैंसला ने भी केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली.
बैंसला ने इस साल फरवरी में हुए गुर्जर आंदोलन का नेतृत्व किया था. वो गुर्जरों के लिए 5 फीसदी आरक्षण की मांग कर रहे थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण पर चुनाव आयोग ने संज्ञान लेते हुए चुनाव अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी को जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपने का आयोग ने आदेश दिया है.
महाराष्ट्र के लातूर में एक रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने पुलवामा का नाम लेते हुए कहा था, "मैं पहली बार वोट देने वालों से कहना चाहता हूं कि क्या आपका पहला वोट उन वीर जवानों को समर्पित होगा, जिन्होंने पाकिस्तान में हवाई हमला किया था. क्या आपका पहला वोट पुलवामा के शहीदों को समर्पित होगा."
सुप्रीम कोर्ट का पीएम मोदी के जीवन पर बनी फिल्म पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.
मोदी के जीवन पर बनी फ़िल्म 11 अप्रैल को रिलीज होने वाली है. लेकिन चुनाव को देखते हुए कांग्रेसी कार्यकर्ता अमन पवार ने इस फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने के लि याचिका दाखिल की थी.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ये फिल्म अचार संहिता का उल्लंघन करती है या नहीं, ये देखना चुनाव आयोग का काम है.
पटना में तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल का घोषणापत्र जारी किया है.
इसके मुताबिक राजद दलितों, पिछड़ों और अति दलितों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण की सुनिश्चित करेगा और निजी क्षेत्र में आरक्षण का प्रावधान करेगा. इसके अलावा उन्होंने 2021 में सभी जातियों की जनगणना कराएंगे.
उन्होंने ये भी कहा कि हर हाथ में रोटी और हर हाथ को काम के सपना को पूरा करेंगे. तेजस्वी ने ये भी बताया कि उनकी पार्टी बिहार से पलायन को रोकने की कोशिश करेगी.
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की स्थिति को बेहतर करने का वादा भी तेजस्वी ने किया है. तेजस्वी ने ये भी कहा कि कांग्रेस के न्याय योजना की उनकी पार्टी पूरा समर्थन करेगी.
सोनिया गांधी 2004 से लगातार रायबरेली का प्रतिनिधित्व करती रही हैं. इससे पहले वो 1999 में अमेठी से सांसद चुनी गई थीं.
वहीं पड़ोसी ज़िले अमेठी से बीजेपी की ओर से स्मृति इरानी ने भी पूजा अर्चना के बाद पर्चा भरा. उनके साथ उनके पति भी मौजूद थे. स्मृति इरानी वहाँ एक बार फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को चुनौती दे रही हैं.
स्मृति इरानी ने भी वहाँ रोड शो किया जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे.
इससे पहले वो यहां रोड शो कर रहे थे. उनके साथ पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, रॉबर्ट वाड्रा सहित पार्टी के सैंकड़ों कार्यकर्ता मौजूद थे.
राहुल गांधी पिछले 15 सालों से यहां से जीतते रहे हैं. यहां उनके ख़िलाफ़ मैदान में बीजेपी की तरफ से स्मृति इरानी होंगी.
राजस्थान में गुर्जरों के नेता किरोड़ी मल बैंसला ने बीजेपी का दामन थाम लिया है.
उनके साथ उनके बेटे विजय बैंसला ने भी केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली.
बैंसला ने इस साल फरवरी में हुए गुर्जर आंदोलन का नेतृत्व किया था. वो गुर्जरों के लिए 5 फीसदी आरक्षण की मांग कर रहे थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण पर चुनाव आयोग ने संज्ञान लेते हुए चुनाव अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी को जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपने का आयोग ने आदेश दिया है.
महाराष्ट्र के लातूर में एक रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने पुलवामा का नाम लेते हुए कहा था, "मैं पहली बार वोट देने वालों से कहना चाहता हूं कि क्या आपका पहला वोट उन वीर जवानों को समर्पित होगा, जिन्होंने पाकिस्तान में हवाई हमला किया था. क्या आपका पहला वोट पुलवामा के शहीदों को समर्पित होगा."
सुप्रीम कोर्ट का पीएम मोदी के जीवन पर बनी फिल्म पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.
मोदी के जीवन पर बनी फ़िल्म 11 अप्रैल को रिलीज होने वाली है. लेकिन चुनाव को देखते हुए कांग्रेसी कार्यकर्ता अमन पवार ने इस फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने के लि याचिका दाखिल की थी.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ये फिल्म अचार संहिता का उल्लंघन करती है या नहीं, ये देखना चुनाव आयोग का काम है.
पटना में तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल का घोषणापत्र जारी किया है.
इसके मुताबिक राजद दलितों, पिछड़ों और अति दलितों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण की सुनिश्चित करेगा और निजी क्षेत्र में आरक्षण का प्रावधान करेगा. इसके अलावा उन्होंने 2021 में सभी जातियों की जनगणना कराएंगे.
उन्होंने ये भी कहा कि हर हाथ में रोटी और हर हाथ को काम के सपना को पूरा करेंगे. तेजस्वी ने ये भी बताया कि उनकी पार्टी बिहार से पलायन को रोकने की कोशिश करेगी.
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की स्थिति को बेहतर करने का वादा भी तेजस्वी ने किया है. तेजस्वी ने ये भी कहा कि कांग्रेस के न्याय योजना की उनकी पार्टी पूरा समर्थन करेगी.
Wednesday, April 3, 2019
'तेजस्वी और तेज प्रताप विवाद' में कहां खड़ी हैं मीसा भारती
लालू परिवार में महीनों से जारी सियासी विरासत की जो लड़ाई छिड़ी है वह त्रिकोणीय है. इसमें पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव के साथ-साथ राज्यसभा सांसद मीसा भारती भी एक कोण हैं.
दरअसल, पारिवारिक विरासत की लड़ाई में मीसा को तीसरा कोण माना जा रहा है.
लालू प्रसाद ने साल 2014 में अपनी डॉक्टर बिटिया मीसा भारती को पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय जनता दल का उम्मीदवार बनाया था. इससे नाराज राजद के वरिष्ठ नेता रामकृपाल यादव ने पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया था.
तब मीसा ने कहा था कि रामकृपाल यादव का राज्यसभा में लंबा कार्यकाल शेष है, इसलिए उन्हें टिकट नहीं मिला.
राजनीति के मैदान में मोदी लहर के बीच पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से ज़ोर आज़मा रही मीसा भारती को भाजपा के प्रत्याशी राम कृपाल यादव ने 40,322 वोट के साधारण अंतर से हराया.
साल 2009 से अस्तित्व में आये इस लोकसभा क्षेत्र से पार्टी तीसरी बार और मीसा भारती दूसरी बार किस्मत आज़मा रही हैं, जिनका राज्यसभा में तीन साल से अधिक का कार्यकाल शेष है.
जानकार बताते हैं कि साल 2014 में चुनाव हारने के बाद डॉ. मीसा भारती को बिहार विधानमंडल में कोई जगह नहीं दी गयी. इससे उपजे असंतोष को दबाने के लिए मीसा को जुलाई, 2016 में पार्टी की ओर से राज्यसभा भेजा गया. जबकि, इसके पहले लालू प्रसाद के बेटों को बतौर उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री बनाकर बिहार में ही रखा गया.
लालू परिवार में छिड़े विरासत की लड़ाई पर वरिष्ठ पत्रकार एसए शाद का मानना है कि तेज प्रताप यादव और मीसा भारती की लड़ाई में फर्क है.
वो कहते हैं कि तीनों का लक्ष्य सामान्य नहीं है. मीसा भारती अपने को सेफ़ ज़ोन में रखकर पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए लड़ रही हैं, जिससे पार्टी को बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं है. उनका विरोधाभास सीमित है और इससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी कोई दिक्कत नहीं है.
इस साल पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी के नाम की घोषणा के पहले मीसा भारती का नाम कहीं चर्चा में नहीं था. उस दौरान तेजप्रताप यादव का मीसा के लिए खुलकर आ जाना अपेक्षित नहीं था. इससे पार्टी पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय का मानना है कि जब तक दोनों भाइयों का उदय राजनीति में नहीं हुआ था तब तक उस घर में सत्ता का एक केंद्र मीसा भारती ही थीं.
हालाँकि, घर में जो सत्ता की लड़ाई छिड़ी है उससे आम लोगों के बीच एक धारणा बन गई है कि मीसा बड़े भाई तेज प्रताप के साथ हैं. मनेर में भाई वीरेंद्र के खिलाफ और मीसा के समर्थन में तेज प्रताप ने एक अभियान तक शुरू कर दिया था.
परिवार में तीनों की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएँ हैं. लेकिन ऐसी अटकलें लगती रही हैं कि मीसा को दोनों भाई बड़ी बहन तो मानते हैं, लेकिन छोटे भाई तेजस्वी व्यवहार पक्ष में मीसा को बतौर नेता स्वीकार नहीं करते हैं.
जबकि, राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं का मानना है कि राजनीति का मीसा भारती से ज्यादा अनुभव किसी भाई- बहन का नहीं है. वे लालू प्रसाद के पंद्रह साल के कार्यकाल की साक्षी रही हैं. कई नीति- योजनाओं के निर्माण को उन्होंने बनते देखा है. तब लालू जी के दोनों बेटे वयस्क नहीं थे.
अभी जो पारिवारिक कलह चल रही है उसकी वजह सब को पता है. मीसा भारती को इससे जोड़ना गलत होगा. राजनीति की समझ उनमें है. वे सुलझी हुई हैं और कोई बहन नहीं चाहेगी कि परिवार में कोई कलह हो.
आज भी परिवार और पार्टी हित से जुड़े मुद्दों पर मीसा सुझाव देती हैं, लेकिन किसी बात पर अड़ती नहीं हैं.
तेजप्रताप के बारे में तो कहा जा रहा है कि वे तो खुद ही अपने को हास्यास्पद परिस्थिति में डाल रहे हैं.
और कहा ये भी जाता है कि इसके पीछे कहीं-न-कहीं उनके विरोधियों का हाथ है, जो चाहते हैं कि लालू परिवार में यह राजनीतिक लड़ाई जारी रहे.
दरअसल, पारिवारिक विरासत की लड़ाई में मीसा को तीसरा कोण माना जा रहा है.
लालू प्रसाद ने साल 2014 में अपनी डॉक्टर बिटिया मीसा भारती को पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय जनता दल का उम्मीदवार बनाया था. इससे नाराज राजद के वरिष्ठ नेता रामकृपाल यादव ने पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया था.
तब मीसा ने कहा था कि रामकृपाल यादव का राज्यसभा में लंबा कार्यकाल शेष है, इसलिए उन्हें टिकट नहीं मिला.
राजनीति के मैदान में मोदी लहर के बीच पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से ज़ोर आज़मा रही मीसा भारती को भाजपा के प्रत्याशी राम कृपाल यादव ने 40,322 वोट के साधारण अंतर से हराया.
साल 2009 से अस्तित्व में आये इस लोकसभा क्षेत्र से पार्टी तीसरी बार और मीसा भारती दूसरी बार किस्मत आज़मा रही हैं, जिनका राज्यसभा में तीन साल से अधिक का कार्यकाल शेष है.
जानकार बताते हैं कि साल 2014 में चुनाव हारने के बाद डॉ. मीसा भारती को बिहार विधानमंडल में कोई जगह नहीं दी गयी. इससे उपजे असंतोष को दबाने के लिए मीसा को जुलाई, 2016 में पार्टी की ओर से राज्यसभा भेजा गया. जबकि, इसके पहले लालू प्रसाद के बेटों को बतौर उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री बनाकर बिहार में ही रखा गया.
लालू परिवार में छिड़े विरासत की लड़ाई पर वरिष्ठ पत्रकार एसए शाद का मानना है कि तेज प्रताप यादव और मीसा भारती की लड़ाई में फर्क है.
वो कहते हैं कि तीनों का लक्ष्य सामान्य नहीं है. मीसा भारती अपने को सेफ़ ज़ोन में रखकर पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए लड़ रही हैं, जिससे पार्टी को बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं है. उनका विरोधाभास सीमित है और इससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी कोई दिक्कत नहीं है.
इस साल पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी के नाम की घोषणा के पहले मीसा भारती का नाम कहीं चर्चा में नहीं था. उस दौरान तेजप्रताप यादव का मीसा के लिए खुलकर आ जाना अपेक्षित नहीं था. इससे पार्टी पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय का मानना है कि जब तक दोनों भाइयों का उदय राजनीति में नहीं हुआ था तब तक उस घर में सत्ता का एक केंद्र मीसा भारती ही थीं.
हालाँकि, घर में जो सत्ता की लड़ाई छिड़ी है उससे आम लोगों के बीच एक धारणा बन गई है कि मीसा बड़े भाई तेज प्रताप के साथ हैं. मनेर में भाई वीरेंद्र के खिलाफ और मीसा के समर्थन में तेज प्रताप ने एक अभियान तक शुरू कर दिया था.
परिवार में तीनों की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएँ हैं. लेकिन ऐसी अटकलें लगती रही हैं कि मीसा को दोनों भाई बड़ी बहन तो मानते हैं, लेकिन छोटे भाई तेजस्वी व्यवहार पक्ष में मीसा को बतौर नेता स्वीकार नहीं करते हैं.
जबकि, राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं का मानना है कि राजनीति का मीसा भारती से ज्यादा अनुभव किसी भाई- बहन का नहीं है. वे लालू प्रसाद के पंद्रह साल के कार्यकाल की साक्षी रही हैं. कई नीति- योजनाओं के निर्माण को उन्होंने बनते देखा है. तब लालू जी के दोनों बेटे वयस्क नहीं थे.
अभी जो पारिवारिक कलह चल रही है उसकी वजह सब को पता है. मीसा भारती को इससे जोड़ना गलत होगा. राजनीति की समझ उनमें है. वे सुलझी हुई हैं और कोई बहन नहीं चाहेगी कि परिवार में कोई कलह हो.
आज भी परिवार और पार्टी हित से जुड़े मुद्दों पर मीसा सुझाव देती हैं, लेकिन किसी बात पर अड़ती नहीं हैं.
तेजप्रताप के बारे में तो कहा जा रहा है कि वे तो खुद ही अपने को हास्यास्पद परिस्थिति में डाल रहे हैं.
और कहा ये भी जाता है कि इसके पीछे कहीं-न-कहीं उनके विरोधियों का हाथ है, जो चाहते हैं कि लालू परिवार में यह राजनीतिक लड़ाई जारी रहे.
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