मारे जाने वालों में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला, प्रदेश के पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और कांग्रेस नेता योगेंद्र शर्मा शामिल थे.
मान लिया गया था कि कांग्रेस पार्टी के लिए राजनीतिक तौर पर इस हमले से उबरने में कई साल लग जाएंगे.
लेकिन कांग्रेस पार्टी फिर से एकजुट हुई और राज्य में विधानसभा की 90 में से 68 सीटों पर जीत हासिल करके सरकार बनाने में कामयाब रही.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शपथ लेने के बाद कुछ ही घंटों के भीतर 2013 में बस्तर की झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले की एसआईटी जांच कराने की घोषणा कर दी.
भूपेश बघेल कहते हैं, "हमारी पार्टी शुरू से कहती रही है कि यह हमला एक षड़यंत्र था और इस मामले में हमारे शहीद नेताओं को न्याय नहीं मिला. हम चाहते हैं कि इस हमले का सच दुनिया के सामने आए."
झीरम घाटी
केंद्रीय मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल के क़रीबी दौलत रोहड़ा से आप बात करें तो एक-एक घटनाक्रम वो इतनी बारिकी से बताते हैं, जैसे सब आज ही हुआ है.
कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार को हटाने के लिए परिवर्तन यात्रा निकाली थी.
25 मई 2013 की सुबह 10 बजे के आसपास यह यात्रा जगदलपुर से सुकमा के लिए निकली. विद्याचरण शुक्ल की गाड़ी में नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल भी थे.
विद्याचरण शुक्ल ने हमेशा से माओवादियों के निशाने पर रहे महेंद्र कर्मा को भी अपनी गाड़ी में साथ आने के लिए कहा. लेकिन महेंद्र कर्मा सुरक्षा का हवाला दे कर दूसरी गाड़ी में चले गए.
सुकमा में सभा हुई और फिर सभी नेता खाना खाने के बाद तीन बजे के आसपास अगले पड़ाव के लिए निकले. विद्याचरण शुक्ल को खाना खाने में देर हुई, इसलिए उनकी गाड़ी दस-पंद्रह मिनट देर से निकली.
दरभा घाटी की ओर विद्याचरण शुक्ल की गाड़ी तेज़ गति से आगे बढ़ रही थी. ड्राइवर के बगल वाली सीट पर विद्याचरण बैठे थे. पीछे दौलत रोहड़ा, युवा कांग्रेसी निखिल द्विवेदी, रामअवतार देवांगन और सुरक्षा गार्ड प्रफुल्ल शुक्ला बैठे थे.
दूसरे नेताओं की गाड़ी के काफिले में शामिल होने की जल्दीबाजी में ड्राइवर ने गाड़ी की स्पीड जैसे ही तेज़ की, दरभा घाटी के पास गाड़ी पर ताबड़तोड़ चार फायरिंग हुई.
किसी की समझ में कुछ नहीं आया. लेकिन अनुभवी ड्राइवर ने गाड़ी नहीं रोकी. उसने चिल्लाते हुए कहा कि नक्सली हमला हो गया है.
दौलत रोहड़ा कहते हैं, "आगे यू टर्न था और हमारे लिए आगे जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. लेकिन हमें कहां मालूम था कि हम मौत के जबड़े में घुसने जा रहे हैं. हमारी गाड़ी मुश्किल से तीन-चार सौ मीटर आगे बढ़ी होगी तो हमने देखा कि वहां पूरा रास्ता जाम था. सारी गाड़ियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग हो रही थी. घने जंगलों की फिज़ा में सब तरफ़ बारूद की गंध भरी हुई थी. हम पूरी तरह से माओवादियों से घिर चुके थे."
रोहड़ा को याद है कि विद्याचरण शुक्ल ने सभी को अपनी-अपनी सीट को पीछे करके लेटने का निर्देश दिया. सभी दम साधे सिर पर मंडराती मौत को महसूस कर रहे थे. लेकिन विद्याचरण शुक्ल के सुरक्षा गार्ड प्रफुल्ल ने अपनी पिस्तौल निकाली और जिस ओर से फायरिंग हो रही थी, उधर जवाबी फायरिंग की.
पूरी गाड़ी को जगह-जगह गोलियों छेद रही थीं. तभी एक गोली अगली सीट पर बैठे विद्याचरण शुक्ल की पेट पर लगी और ख़ून का फव्वारा छूट गया. एक गोली पिछली सीट पर बैठे कांग्रेसी नेता को लगी और पिछली सीट पर बैठे सभी लोगों के चेहरे ख़ून से सन गए.
Friday, December 21, 2018
Friday, December 7, 2018
खेतों को महिलावादी आंदोलनों की ज़रूरत क्यों?: ब्लॉग
किसान और महिला किसान में क्या अंतर होता है? आदर्श रूप से इनमें कोई अंतर नहीं होना चाहिए.
एक कर्मी और महिलाकर्मी, एक खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी और यहां तक कि मर्द और औरत के बीच किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.
लेकिन ऐसा नहीं है. हमलोग एक आदर्श दुनिया में नहीं जीते हैं. इसलिए हमलोग गैरबराबरी, पितृसत्ता, यौन दुर्व्यवहार जैसी चीज़ों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं. और महिलावादी आंदोलन भी इन्हीं सब चीज़ों की बात करता है.
समान अधिकार, समान वेतन, निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागिता और किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हल्ला बोलना ही इसका मक़सद है.
तो फिर महिलावादी आंदोलनों से हमने महिला किसानों को दूर क्यों रखा है?
हमारे देश में किसानों की स्थिति कैसी है, यह किसी से छिपा नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं, "हमारे सामने बहुत बड़ा कृषि संकट आ खड़ा हुआ है और अगर हमने इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की तो इसका भारी असर होगा."
शायद इसलिए किसान बार-बार आंदोलन कर रहे हैं. दिल्ली, मुंबई समेत पूरे देश में वो अपनी मांगों को लेकर मोर्चा और रैलियां निकाल रहे हैं.
लेकिन किसी ने भी महिला किसानों के मुद्दे पर बात नहीं की. बेशक महिला किसानों की परेशानियां पुरुष किसानों से अलग नहीं हैं, लेकिन वो निश्चित रूप से अधिक हैं.
सरकार, किसानों के संगठन और महिलावादी आंदोलन कब इस पर विचार करेंगे कि महिला किसानों को क़र्ज़माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के कहीं अधिक मदद की ज़रूरत है.
घरेलू हिंसा और यौन दुर्व्यवहार की शिकार महिला किसान
दिल्ली में किसानों के मार्च के दौरान मेरी मुलाक़ात महिला किसान अधिकार मंच की एक्टिविस्ट सीमा कुलकर्णी से हुई.
सीमा कहती हैं, "कोई महिला किसानों की तकलीफ़ों पर बात नहीं करता, जिसे उन्हें सिर्फ़ एक महिला होने के चलते झेलना पड़ता है. दुर्भाग्य से जब भी मीडिया किसानों की बात करता है, वो महिला किसानों के मुद्दों को किनारे कर देता है."
एक अध्ययन के मुताबिक़ क़रीब 78 फ़ीसदी महिला किसानों को यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है और यहीं से चिंताओं की शुरुआत होती है.
इसके अलावा उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है और उन्हें उनके अधिकारों और निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है.
मैं महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाक़े मराठवाड़ा की एक महिला किसान से बात कर रही थी. उनके और उनके पति के पास एक छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा है, जिस पर वो खेती करते हैं.
उनके पति उन्हें अक्सर पीटा करते हैं. एक बार उनके पति ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था और दूसरी महिला के साथ शादी रचा ली थी.
इसके कुछ दिन बाद उनके पति ने दूसरी महिला के साथ भी मारपीट शुरू कर दी. अब दोनों साथ रहती हैं और बच्चों के पेट भरने के लिए मज़दूरी करती हैं.
वो कहती हैं, "जिस खेत को मैं और मेरे पति जोता करते थे, अगर मैं उस ज़मीन पर मेरा भी हक़ होता तो मेरी स्थिति कुछ अलग होती."
एक कर्मी और महिलाकर्मी, एक खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी और यहां तक कि मर्द और औरत के बीच किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.
लेकिन ऐसा नहीं है. हमलोग एक आदर्श दुनिया में नहीं जीते हैं. इसलिए हमलोग गैरबराबरी, पितृसत्ता, यौन दुर्व्यवहार जैसी चीज़ों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं. और महिलावादी आंदोलन भी इन्हीं सब चीज़ों की बात करता है.
समान अधिकार, समान वेतन, निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागिता और किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हल्ला बोलना ही इसका मक़सद है.
तो फिर महिलावादी आंदोलनों से हमने महिला किसानों को दूर क्यों रखा है?
हमारे देश में किसानों की स्थिति कैसी है, यह किसी से छिपा नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं, "हमारे सामने बहुत बड़ा कृषि संकट आ खड़ा हुआ है और अगर हमने इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की तो इसका भारी असर होगा."
शायद इसलिए किसान बार-बार आंदोलन कर रहे हैं. दिल्ली, मुंबई समेत पूरे देश में वो अपनी मांगों को लेकर मोर्चा और रैलियां निकाल रहे हैं.
लेकिन किसी ने भी महिला किसानों के मुद्दे पर बात नहीं की. बेशक महिला किसानों की परेशानियां पुरुष किसानों से अलग नहीं हैं, लेकिन वो निश्चित रूप से अधिक हैं.
सरकार, किसानों के संगठन और महिलावादी आंदोलन कब इस पर विचार करेंगे कि महिला किसानों को क़र्ज़माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के कहीं अधिक मदद की ज़रूरत है.
घरेलू हिंसा और यौन दुर्व्यवहार की शिकार महिला किसान
दिल्ली में किसानों के मार्च के दौरान मेरी मुलाक़ात महिला किसान अधिकार मंच की एक्टिविस्ट सीमा कुलकर्णी से हुई.
सीमा कहती हैं, "कोई महिला किसानों की तकलीफ़ों पर बात नहीं करता, जिसे उन्हें सिर्फ़ एक महिला होने के चलते झेलना पड़ता है. दुर्भाग्य से जब भी मीडिया किसानों की बात करता है, वो महिला किसानों के मुद्दों को किनारे कर देता है."
एक अध्ययन के मुताबिक़ क़रीब 78 फ़ीसदी महिला किसानों को यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है और यहीं से चिंताओं की शुरुआत होती है.
इसके अलावा उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है और उन्हें उनके अधिकारों और निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है.
मैं महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाक़े मराठवाड़ा की एक महिला किसान से बात कर रही थी. उनके और उनके पति के पास एक छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा है, जिस पर वो खेती करते हैं.
उनके पति उन्हें अक्सर पीटा करते हैं. एक बार उनके पति ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था और दूसरी महिला के साथ शादी रचा ली थी.
इसके कुछ दिन बाद उनके पति ने दूसरी महिला के साथ भी मारपीट शुरू कर दी. अब दोनों साथ रहती हैं और बच्चों के पेट भरने के लिए मज़दूरी करती हैं.
वो कहती हैं, "जिस खेत को मैं और मेरे पति जोता करते थे, अगर मैं उस ज़मीन पर मेरा भी हक़ होता तो मेरी स्थिति कुछ अलग होती."
Monday, December 3, 2018
कांग्रेस-एनसीपी से क़रीब हो रहे हैं राज ठाकरे?
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने बीते रविवार मुंबई में आयोजित उत्तर भारतीय महापंचायत कार्यक्रम में पहली बार हिंदी भाषा में लोगों को संबोधित किया.
इस कार्यक्रम में उन्होंने एक बार फिर मुंबई में आकर रहने वाले उत्तर भारतीयों को लेकर अपने राजनीतिक रुख़ को सामने रखा.
लेकिन सवाल ये है कि राज ठाकरे को इस मुद्दे को लेकर उत्तर भारतीयों के बीच क्यों जाना पड़ा.
बीबीसी मराठी ने इस मुद्दे पर राज ठाकरे की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों से बात की.
उत्तर भारतीय वोट बैंक
मराठी अख़बार दैनिक लोकमत से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार संदीप प्रधान कहते हैं कि राज ठाकरे को महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीय लोगों की अहमियत का अहसास हो रहा है जो कि एक बड़ी बात है.
पहले उद्धव ठाकरे अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर के मुद्दे पर लोगों का दिल जीतने की कोशिश करते हैं. फिर राज ठाकरे उत्तर भारतीय महापंचायत के कार्यक्रम में शामिल होते हैं और पहली बार हिंदी में भाषण देते हैं. ये अपने आप में ख़ास है."
"भाषण के आख़िर में वह बोलते हैं, ''मराठी लोगों के हितों की रक्षा करना उनका मुख्य काम है, लेकिन तीन चार पीढ़ियों से मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीय भी अपने ही हैं. साल 2000 में उद्धव ठाकरे ने 'मी मुंबईकर' नाम का अभियान चलाया था जिसमें उन्होंने मुंबई में रहने वाले सभी समुदायों को एक साथ लाने की कोशिश की थी. राज ठाकरे जो अब कर रहे हैं, ये उस अभियान जैसा ही है."
संदीप प्रधान इस रणनीति को समझाते हुए बताते हैं, "साल 1995 में, जब महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की सरकार थी. तब उस गठबंधन सरकार ने झुग्गियों में रहने वाले लोगों को मुफ़्त में घर देने का ऐलान किया था. इस योजना की वजह से उत्तर भारत से कई लोग मुंबई में आकर बसने लगे. राज ठाकरे ने उस योजना को लेकर अपनी नारज़गी ज़ाहिर की है."
"उस दौर में राज ठाकरे शिव सेना के प्रभावशाली नेताओं में से एक थे. अपने हालिया भाषण में उन्होंने इस योजना का ज़िक्र करते हुए इसके प्रति नाराज़गी जताई जो कि एक बड़ी बात है. उद्धव और राज ठाकरे को एक बात समझ में आ गई है कि मुंबई, ठाणे और नासिक में मराठी मानुष का मुद्दा उन्हें राजनीतिक प्रगति नहीं दे सकता. इन्हें ये पता चल गया है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से महाराष्ट्र में कमाने-खाने आए लोगों के वोट भी मराठी समुदाय के वोटों जितने ही अहम हैं."
इस कार्यक्रम में उन्होंने एक बार फिर मुंबई में आकर रहने वाले उत्तर भारतीयों को लेकर अपने राजनीतिक रुख़ को सामने रखा.
लेकिन सवाल ये है कि राज ठाकरे को इस मुद्दे को लेकर उत्तर भारतीयों के बीच क्यों जाना पड़ा.
बीबीसी मराठी ने इस मुद्दे पर राज ठाकरे की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों से बात की.
उत्तर भारतीय वोट बैंक
मराठी अख़बार दैनिक लोकमत से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार संदीप प्रधान कहते हैं कि राज ठाकरे को महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीय लोगों की अहमियत का अहसास हो रहा है जो कि एक बड़ी बात है.
पहले उद्धव ठाकरे अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर के मुद्दे पर लोगों का दिल जीतने की कोशिश करते हैं. फिर राज ठाकरे उत्तर भारतीय महापंचायत के कार्यक्रम में शामिल होते हैं और पहली बार हिंदी में भाषण देते हैं. ये अपने आप में ख़ास है."
"भाषण के आख़िर में वह बोलते हैं, ''मराठी लोगों के हितों की रक्षा करना उनका मुख्य काम है, लेकिन तीन चार पीढ़ियों से मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीय भी अपने ही हैं. साल 2000 में उद्धव ठाकरे ने 'मी मुंबईकर' नाम का अभियान चलाया था जिसमें उन्होंने मुंबई में रहने वाले सभी समुदायों को एक साथ लाने की कोशिश की थी. राज ठाकरे जो अब कर रहे हैं, ये उस अभियान जैसा ही है."
संदीप प्रधान इस रणनीति को समझाते हुए बताते हैं, "साल 1995 में, जब महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की सरकार थी. तब उस गठबंधन सरकार ने झुग्गियों में रहने वाले लोगों को मुफ़्त में घर देने का ऐलान किया था. इस योजना की वजह से उत्तर भारत से कई लोग मुंबई में आकर बसने लगे. राज ठाकरे ने उस योजना को लेकर अपनी नारज़गी ज़ाहिर की है."
"उस दौर में राज ठाकरे शिव सेना के प्रभावशाली नेताओं में से एक थे. अपने हालिया भाषण में उन्होंने इस योजना का ज़िक्र करते हुए इसके प्रति नाराज़गी जताई जो कि एक बड़ी बात है. उद्धव और राज ठाकरे को एक बात समझ में आ गई है कि मुंबई, ठाणे और नासिक में मराठी मानुष का मुद्दा उन्हें राजनीतिक प्रगति नहीं दे सकता. इन्हें ये पता चल गया है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से महाराष्ट्र में कमाने-खाने आए लोगों के वोट भी मराठी समुदाय के वोटों जितने ही अहम हैं."
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